Description
शायद ये कहानियाँ न होते हुये जीवन की वास्तविक घटनायें ज्यादा हैं। मेरी संवेदनशीलता ने ऐसी घटनाओं को थोड़ा सा मोड़ देते हुए कहानी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास तब किया था जब मेरे जैसे काम में डूबे रहने वाले व्यक्ति के पास आफिस में कोई कार्य ही नही था। मैं तो जीवन को दूब घास की तरह मानता हूँ जिसको कोई काटे, उखाड़े या फिर जला दे, वह पानी की पहली बौछार के साथ ही फिर हरी हो जाती है। मेरी ये सभी रचनायें पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं जो पाठकों द्वारा बेहद सराहीं गयीं। आशा है कि 'पोथी.कॉम' के माध्यम से इनको पाठकों का विस्तार मिलेगा।
मैं यह पुस्तक अपनी 'इजा' को समर्पित करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि अगला जीवन भी उनके पुत्र के रूप में ही प्राप्त हो।
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26 February 2010 - 9:26pm
एक ही कार्यक्षेत्र से जुड़े होने के कारण मेरा लम्बे समय से इंजीनियर हेम चन्द्र जोशी जी से परिचय रहा है। कार्यक्षेत्र में उनसे जुडे लोग उनको एक निष्ठावान, ज्ञानी, कुशल, एवं अनुभवी कृषि अभियंता और एक कु”ाल प्रशासक व एक मजबूत व अच्छे इंसान के रूप में जानते हैं लेकिन इन बाल कथाओं के संकलन को पढ़ने के बाद उनकी यह तस्वीर धुॅधली सी प्रतीत होती है व उनका एक नवीन व स्पष्ट चित्र जो सामने उभरता है उसमें वह महानतम बाल साहित्यकारों की कतार में खड़े एक उच्च कोटि के लेखक प्रतीत होते हैं।
मैंने अपने अध्ययनकाल में कई साहित्य लेखकों को पढ़ा है जिसमें से स्व. श्री मुंशी प्रेमचंन्दजी भी एक हैं जिन्होंने मेरे अन्तर्मन व भावनाओं को स्पर्”ा किया है। इंंजीनियर जोशी जी की इन लघु कथाओं को पढ़ने में स्व. मुशी प्रेमचंन्द जी की रचनाओं जैसा आनन्द मिलता है और उसका धन्यवाद न देना कृतज्ञहीनता होगी। उन्होंने जीवन की घटनाओं का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है जिनमे जीवन व समाज की सच्चाइयों की झलक मिलती है। कभी-कभी तो लगता है कि मेरे अपने ही जीवन की कुछ घटनाओं के वे भी जानकार हैं जिसका संकलन उन्होने बड़ी सजीवता से किया है। इन बाल कथाओं के कुछ मोड़ हृदय को इतना झंकरित करते है कि अ़श्रुधारा को काबू मु”िकल से करना पड़ता है।
यह कथाएं यह बताती है कि इं. जोशी जी एक उच्च संस्कारित व्यक्ति हैं जो समाज मे बच्चों के मनोविज्ञान को पूर्णतः समझते हैं। इन बाल कथाओं के पाठन से बच्चों में नैतिक मूल्यों की वृद्धि अव”य होगी। मेरी तुच्छ राय में इं. जो”ाी जी को इस सकलन को विद्यालयों के पुस्तकालयों में, राज्य के शिक्षा मंत्रालयों को व मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अव”य प्रेषित करना चाहिए जिससे इसकी प्रतियां पढ़ने वालें बच्चों तक पहुॅच सके और वे इसे पढ़कर लाभान्वित हो सकें।
मैं ऐसी कामना करता हॅू कि भविष्य में इं. जोशी जी इस अच्छे कार्य को क्षितिज तक ले जायें जिसकी कि उनमें अपार क्षमता है। ई”वर से मैं उनकी सफलता की प्रार्थना करता हॅू।
शैलेन्द्र शाह
29 September 2009 - 9:01am
बचपन की कहानियां
"अब नहीं बाबूजी"
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Mired Mirage said...
जोशी जी, यदि यह कहानी है तो बेहद सशक्त कहानी है और यदि आपबीती है तो बहुत विचलित करने वाली है। यदि आपबीती है तो इसका दंश आज भी कम नहीं हुआ होगा।
पढ़कर यही कह सकती हूँ कि कई बार धोखा खाकर भी मैं संतुष्ट हूँ कि मैं ऐसे अनुभव और पश्चात्ताप से बची रही हूँ।
घुघूती बासूती
22 December 2008 00:30
संगीता पुरी said...
बहुत अच्छी सीख भरी कहानी लिखी है आपने....धर्म की सही परिभाषा भी नहीं समझ पाए हैं अभी तक हमलोग ....उसकी सही जगह आने पर मुंह मोड लेते हैं हमलोग।
22 December 2008 00:57
27 September 2009 - 8:22am
"कहानी : हेम चन्द्र जोशी :अगली सुबह"
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dinanath said...
ekadam dil ko choo jane wali kahani hai
14 January 2009 18:38
Mired Mirage said...
कैसे सोच और लिख लेते हैं ऐसी हृदय को छू लेने वाली कहानियाँ ? ऐसी कहानियाँ आजकल केवल आपके ब्लॉग पर मिलती हैं अन्यत्र कहीं नहीं। आपकी लेखनी को प्रणाम ।
घुघूती बासूती
15 January 2009 04:25
Nirmla Kapila said...
bahut bhavmay kahani hai bdhaai
15 January 2009 05:21
Anonymous said...
यथार्थ ी अनुभुति करवाने हेतु शत शत बधाई.
15 January 2009 18:32
ramesh said...
अविश्वनीय पकड है आपकी. एक अच्छी रचना है आपकी.
15 January 2009 19:06
"पापा क्यों रोये ? A hindi story by Hem Chandra joshi"
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अनूप शुक्ल said...
बहुत सुन्दर!
09 January 2009 18:55
ashok said...
The Great.......
09 January 2009 22:05
Dr.Parveen Chopra said...
यह शब्दों का कैसा जादू है, साहब, कि इसे पढ़ते पढ़ते हमारी आँखें भी दो-तीन बार भीग गईं और बड़ी मुश्किल से अपने ऊपर काबू किया---- कहानी बहुत ही बढ़िया लगी -- साहब ...आज के एक मध्यवर्गीय परिवार की मानवीय संवेदनाओं से भरी पड़ी एक कहानी है।
इसे पढ़ते हुये यह लगा ही नहीं कि कोई कहानी पढ़ रहे हैं ---- सार्थक लेखन भी सचमुच मन के तारों में जबरदस्त झनझनाहट पैदा कर देता है।
2009 की बहुत बहुत शुभकामनायें।
09 January 2009 23:37
vinay said...
mujhey apney bachpan ke din yaad aa gaye, mere papa custom aur central excises main assitant collector they,parntu imandar hum dono bhaiyon ko awvhavo main bachpan gujarna pada.
10 January 2009 06:18
स्वाति said...
वाकई इतना सहज और सशक्त लेखन है की पढ़ते पढ़ते आंखे भीग गई . प्रेरक और सुंदर रचना
22 January 2009 22:26
"चन्नी : Hindi story by Hem Chandra Joshi"
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PD said...
बहुत मार्मिक बातें लिखी है आपने.. आंखें नम हो गई..
27 December 2008 23:48
mehek said...
bahut marmik katha,channi dil ko bhaa gayi.
28 December 2008 01:04
Mired Mirage said...
बहुत ही मार्मिक व सशक्त कहानी ! चन्नी सी कितनी बच्चियाँ ऐसे लांछनों का शिकार होती रहती हैं।
घुघूती बासूती
28 December 2008 09:11
"कहानी:बैसाखियाँ : हेम चन्द्र जोशी"
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अशोक मधुप said...
बहुत शानदार एवं प्रेरणा देने वाली कहानी। बधाई
07 February 2009 08:57
"कहानी: पहली सीढ़ी: हेम चन्द्र जोशी"
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MANVINDER BHIMBER said...
अच्छी पोस्ट और गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई
26 January 2009 01:12
विनय said...
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें
26 January 2009 07:06
Dr Ramesh Chandra Joshi said...
भाव प्रद कहा्नी के लिये बधाई.
26 January 2009 08:09
संगीता पुरी said...
बहुत अच्छा.....गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
26 January 2009 09:25
27 September 2009 - 8:12am
"थैंक्यू डाक्टर: कहानी: हेम चन्द्र जोशी"
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नदीम अख़्तर said...
बहुत अच्छी लगी यह कहानी। काश ऎसा नन्हा मरीज़ हर डॉक्टर को मिले, और वह दोगुने उत्साह से काम में लग जाये...।
12 April 2009 00:14
hem pandey said...
सौम्या का मुस्कुराता चेहरा और प्रगट होता छोटा सा दांत एक डाक्टर को कितनी तसल्ली दे सकता है, कहानी में यह चित्र सजीव हो उठा है.
12 April 2009 04:01