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Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई (eBook)

Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई (eBook)

Selected Ghazals of Sanjay Grover

by संजय ग्रोवर / Sanjay Grover (1 review, add another)
Type: e-book
Genre: Poetry
Language: Hindi
Price: Rs.50.00
Available Formats: PDF Immediate Download on Full Payment
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Description of "Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई (eBook)"

इनमें से कई ग़ज़लें कई-कई बार छपीं तो कुछेक कई-कई बार चोरी भी हुईं। दिल खोलकर तारीफ़ भी की गयी तो आलोचना की तलवार भी भांजी गयी। पर न तो मैं किसीका शिष्य बन पाया न कोई मुझे अपना गुरु बना सका। अब मज़ा यह कि बीच में न तो संपादक है न कवि-मंचो, सेमिनारों में जुगाड़ भिड़ाकर घुसने की मजबूरियां। इंटरनेटीय लोकतंत्र ने लेखकों/कलाकारों को जनता/दर्शक/ऑडिएंस के बिलकुल सामने खड़ा कर दिया है। यह सीधी मुठभेड़ का वक्त है। ऐसे में मैं अपना यह ग़ज़ल-संग्रह आपके सामने पेश कर रहा हूं। इसके आवरण भी मैंने ही बनाए हैं।

*राय जुदा-जुदा (पिछले ग़ज़ल-संग्रह पर)*

*देवताओं, अवतारों और खु.दाओं की इस ग़ैर-इन्सानी दुनिया में खुद को एक अदद आदमी बनाए रखने की इसी ज़िद ने ज़िन्दगी की बेहतरी के नये-नये रास्ते बनाए हैं ।
-नरेंद्र, युद्धरत आम आदमी, जुलाई-सितम्बर 2002

*ये तीसरी धारा की वे ग़ज़लें हैं जो न मंचीय हैं न व्यवस्था विरोध के सरल फार्मूले को अपनाती हैं ।
-ज्ञानप्रकाश विवेक (इसी पुस्तक की भूमिका में)

*आपकी ग़ज़लें कहीं-कहीं से कभी अच्छी और कभी बहुत अच्छी लगीं । इन ग़ज़लों के स्वर धीमे मगर गहरे हैं । कहन और कथ्य के मिलाप का सलीका इनका हुस्न है ।
-निदा फ़ाज़ली (शायर को लिखे एक जवाबी ख़त में)

About the author(s)

*नामः संजय ग्रोवर /
*शिक्षाः बी.कॉम. /
*जन्म तिथिः 05-04-1963/
*सम्प्रतिः स्वतंत्र-लेखन/
*रुचियां : पढना, संगीत सुनना (लाइट एवं क्लासिकल), कार्टूनिन्ग,फैशन-डिज़ाइनिन्ग,
कॉपी-राइटिंग..../
*प्रकाशनः--
जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, दै.हिन्दुस्तान, अमर-उजाला, दैनिक भास्कर, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, जेवीजी टाइम्स, दैनिक आज, राजस्थान-पत्रिका, अक्षर-भारत, हंस, कादम्बिनी, अन्यथा, मुक्ता, चंपक, बालहंस, कथादेश ,सण्डे पोस्ट वार्षिकी, समयांतर, अक्षरा आदि कई छोटे-बडे़ पत्र-पत्रिकाओं व (अनुभूति, अभिव्यक्ति, वेबदुनिया, शब्दांजलि, कलायन, साहित्यकुंज, रचनाकार, हिन्दी-नेस्ट, देशकाल, मोहल्लालाइव, लेखक मंच, आखर कलश, मीडिया मोरचा, हिंदी गौरव आदि) वेबसाइटस्, फ़ीचर एजेंसिंयों एवं आकाशवाणी/दूरदर्शन पर व्यंग्य-लेख, ग़ज़लें, कविताएं, बालगीत, कार्टून व नारी-मुक्ति पर लेख प्रकाशित/प्रसारित//
*गजल-संग्रह ‘खुदाओं के शहर में आदमी’
एवं व्यंग्य-संग्रह ‘मरा हुआ लेखक सवा लाख का’ प्रकाशित//.
विशेषः-तकरीबन 15-16 की आयु में हस्तलिखित सचित्र बाल पत्रिका ‘निर्माण’ का संपादन व चित्रांकन//

*संपर्क:
147ए, पॉकेट ए,
दिलशाद गार्डन,
दिल्ली-95 फोन: 9910344787, 8585913486/

email: samvadoffbeat@yahoo.co.in
: sanjay.grover01@gmail.com/
Blogs : http://www.samwaadghar.blospot.com
: http://saralkidiary.blogspot.in
: http://paagal-khaanaa.blogspot.com
: http://nastiktheatheist.blogspot.in
: http://filmaurmai.blogspot.in/
: http://samvadjunction.blogspot.in/
: http://quotesofmin.blogspot.in/

संजय ग्रोवर को कॉपी करके गूगल या किसी भी अन्य सर्च में डालकर खोजेंगे तो बेहतर परिचय जान पाएंगे।

Book Details
Publisher: 
Sanjay Grover
Availability: Available for Download (e-book)
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Reviews of "Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई (eBook)"
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Comments

Re: Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई by sunilbalani
29 April 2012 - 12:27pm

ग़ज़ल की आत्मा है इस की अनुभूति और उसका सोंदर्य है इसकी अभिव्यक्ति , कवि मन की संवेंदनशीलता को जब बुधितत्व के पंख मिलते हैं तो उस शैली से उन ग़ज़लों का जन्म होता है जैसी संजयजी ने इस संग्रह में पिरोई है ....संजय की शायरी का एक प्रभावशाली पक्ष ये है कि उनकी दृष्टि सदैव भीतर के आदमी और उसके गिर्द समाज पर टिकी रहती हैं , जो बात संजयजी की रचनाओं में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वो है उनका बेबाकी से यथार्थ कह देना , जैसे उनकी ये ग़ज़ल

बाबा, बिक्री, बड़बोलापन, चमत्कार थे चौतरफा
तर्क की बातें करने वाले सच्चे लोग कहां गुम थे!
उनपे हंसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे अकसर हंसते हैं
ईमां वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालुम थे

एक ग़ज़ल में शब्दों का इस्तेमाल किस तरह से किया जाय, ये बहुत मायने रखता है ...छोटे बहर में बड़ी बात कह जाना एक हुनर है , जो संजयजी के पास यक़ीनन है , गौर करिए यहाँ ग़ज़ल के आखिरी शेर में एक ही शब्द ,फन के उर्दू, अंग्रेजी और उर्दू मायने इसे एक नया आयाम देते हैं ....
असल में रीड़ ही इसकी नहीं है
वो सदियों से इसी फन पे टिका है

उनकी शायरी फूल-चाँद ,जुल्फ और मोह्हबत की शायरी नहीं बल्कि एक विद्रोही मन की अभिव्यक्ति है जो व्यवस्थाओं से परेशान भी है और हैरान भी... मगर कुछ बदल न पाने की असमर्थता से बेबस भी .... उनकी शायरी में हमारे समाज पर.... हमारे दोहरे मापदंडो पर ,गहरे प्रहार हैं ,
इस सदी की आस्था को देखकर मैं डर गया
बच्चे प्यासे मर गए और दूध पी पत्थर गया।
हिन्दू भी नाराज़ मुझसे मुस्लमान भी है खफा
होके इंसान ,यार मेरे, जीते जी मैं मर गया

यह दुखद है की इस दौर में जहाँ रसूख वालों की तुकबंदी को भी हमारा मीडिया शायरी बता रहा है , और इधर उधर से चुराई गयी रचनाओं को इक्कठा करके भी लोग कवि बन गए हैं उन्ही की एक ग़ज़ल के शब्द है
तलघर में आयोजित सूरज
फिर निकला प्रायोजित सूरज
आसमान के पांव पकड़कर
हो जाता अनुमोदित सूरज

मगर मुझे लगता है , उनकी रचनाओं की मौलिकता को न किसी आयोजन की आवश्यता है न प्रयोजन की जरुरत , क्योंकि उनकी रचनाएँ दुष्यंत , अदम की राह पे अग्रसर होती हैं ,जहाँ चढाई पावों से नहीं इरादों से चड़ी जाती है ,और जहाँ दरीचे खुद ही द्वार बन जाते हैं......... आज जहाँ बस भीड़ सच का मायने हुई नज़र आती है उस दौर में संजय की मौलिक शायरी को पड़ना एक सुखद अनुभव है .....ग़ज़ल के हर कद्रदान को इस संकलन को जरुर पड़ना चाहिए ....इसी संकलन के चंद शेर , जो आग्रह भी है और चुनोती भी .....

रफ़्तार को ठुकराइए मेरी ग़ज़ल के संग
कुछ देर ठहर जाइये मेरी ग़ज़ल के संग
हिन्दू या मुस्लमान बनकर इसको न पढ़े
इंसानियत दिखलाइये मेरी ग़ज़ल के संग....

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