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Kurukshetra Yuddha

Kurukshetra Yuddha

by Mrinal Rai (write a review)
Type: Print Book
Genre: History,
Language: Hindi,
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Description of "Kurukshetra Yuddha"

कुरुक्षेत्र युद्ध हिन्दू धर्म ग्रन्थ महाभारत के युद्ध पर आधारित एक उपन्यास है । इसमें महाभारत में वर्णित अट्ठारह दिनों के भीषण युद्ध की विस्तृत जानकारी है । ये कथा एक महाग्रन्थ को एक युद्ध के दृष्टिकोण से समझाती है । कुरुक्षेत्र की भूमि पर वर्षों पहले भारत देश के बड़े बड़े योद्धा‌ओं के बीच एक महायुद्ध लड़ा गया था । इस युद्ध में एक ओर जु‌ए में छल से पराजित और अपमानित हु‌ए पांच योद्धा भा‌ई “पाण्डव” थे और दूसरी ओर उनके ही ता‌ऊ के सौ पुत्र, “कौरव” ।

कौरवों में सबसे बड़ा भा‌ई दुर्योधन पांचों शक्तिशाली भा‌इयों के सामने भी अपनी सेना को अधिक बलवान मानता था क्योंकि उस सेना में तीन ऐसे योद्धा थे जिन्हे संसार की को‌ई सेना अकेले भी पराजित नहीं कर सकती थी । ये थे कौरवों और पाण्डवों के दादा भीष्म, कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य और दुर्योधन का परम मित्र कर्ण । भीष्म ने दुर्योधन की सेना का सेनापति होना स्वीकार किया किन्तु इस शर्त पर कि कर्ण युद्ध से दूर रहेगा । दुर्योधन ने भीष्म को सेनापति बनाकर भारतवर्ष के बड़े बड़े राजा‌ओं को अपनी ओर मिला लिया ।

पाण्डवों में सबसे बड़ा भा‌ई युधिष्ठिर भी अपनी सेना को श्रेष्ठ मानता था क्योंकि तृतीय पाण्डव अर्जुन संसार का सबसे कुशल और द्वितीय पाण्डव भीम संसार का सबसे बलवान योद्धा था । किन्तु फिर भी उसका सबसे बड़ा विश्वास था उसका ममेरा भा‌ई वासुदेव कृष्ण जो द्वारिका का राजा था और सभी उसे देवावतार मानते थे । कृष्ण, जो स्वयं एक कुशल राजनीतिज्ञ था, उसने युद्ध में शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा ली और अर्जुन के रथ का सारथी बनना स्वीकार किया था । किन्तु उस रहस्यमयी योद्धा के मन में इस युद्ध को जीतने की एक अलग ही नीति तैयार हो चुकी थी ।

कुरुक्षेत्र की भूमि पर भारत के बड़े बड़े क्षत्रिय राजा युद्ध में भाग लेने आ‌ए थे । इनमें बहुत से वयोवृद्ध राजा अपने साथ बीते वर्षों की कथा‌एं और अनुभव लेकर आ‌ए थे और बहुत से राजा मन में विषाद, ग्लानि, क्रोध, प्रतिशोध आदि भावना‌एं लि‌ए कौरवों अथवा पाण्डवों की ओर से युद्ध करने आ‌ए थे ।

दोनों ओर के योद्धा‌ओं के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र भी युद्ध में भाग लेने आ‌ए थे । इन युवा‌ओं को जीवन में अधिक अनुभव प्राप्त नहीं था किन्तु फिर भी वे वीर थे । अपने पिता और कुल की महानता से प्रभावित ये सभी अपने ज्येष्ठ और पूर्वजों की कथा‌एं सुनकर उनसे प्रेरणा लेते थे और प्रतिदिन युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन करते थे ।

कुरुक्षेत्र युद्ध का पहला भाग ‘युगान्त’ आरम्भिक दस दिनों के युद्ध की कहानी दर्शाता है । दस दिनों के युद्ध का विस्तृत वर्णन, व्यूहों का गठन, एक दिन के युद्ध के बाद सांझ को युवा‌ओं का गुरु‌ओं और ज्येष्ठ जनों से कथा‌एं सुनना, प्रतिदिन बड़े बड़े सूरमा‌ओं का वध और इन सभी का सचित्र वर्णन । इस पुस्तक में क‌ईं चित्र हैं जिन्हे लेखक ने स्वयं बनाया है और ये चित्र कथा को अभिव्यक्त करने में सहायक होते हैं ।

About the author(s)
Author name is Mrinal Rai. Since childhood he has interest in drawing and painting. MBA in Marketing, a computer engineer and working as a marketing manager in a MNC, Mrinal's interest still lies in art, writing and drawing. To be associated with his art work, he also does freelance artist work. He has been inspired by the story of the epic Mahabharata. When he read the Kisari Mohan Ganguly's translation of the epic done in 1880s, the detailed description of the Kurukshetra war left a deep impact on his mind and he decided that he will tell the story of the great war in a way never told before with his own drawings. The result of such determination is this book "Kurukshetra Yuddha"
Book Details
ISBN: 
9789350875131
Publisher: 
Lotus Of Saraswati
Number of Pages: 
590
Availability: In Stock
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